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मूल शांति पूजन

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मूल शांति पूजन

मूल शांति पूजन एक विशेष वैदिक अनुष्ठान है जो जातक की जन्म नक्षत्र में मूल नक्षत्र होने पर किया जाता है। हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक की कुंडली में कुछ विशेष ग्रहयोग होते हैं, जो उनके जीवन और उनके परिवार पर प्रभाव डाल सकते हैं। इन संभावित दोषों की शांति और कल्याण के लिए यह पूजन किया जाता है।

मूल शांति पूजन का अर्थ:

“मूल शांति पूजन” एक वैदिक धार्मिक अनुष्ठान है, जिसका उद्देश्य उस जातक के जीवन में सुख, शांति और कल्याण सुनिश्चित करना होता है, जिसका जन्म गंडमूल नक्षत्र में हुआ हो।

शब्दार्थ:

  • मूल (Mool):
    इसका अर्थ है जड़ या मूल कारण। ज्योतिष में “मूल” शब्द उन छः नक्षत्रों (अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती) के लिए प्रयुक्त होता है, जिन्हें ग्रहदोष युक्त या संवेदनशील माना जाता है।

  • शांति (Shanti):
    इसका अर्थ है दोषों की निवृत्ति और मानसिक, शारीरिक तथा पारिवारिक कल्याण हेतु शांति का विधान।

  • पूजन (Poojan):
    पूजा यानी ईश्वर की उपासना, मंत्र-जप, हवन आदि द्वारा वैदिक विधि से दोषों की निवृत्ति का प्रयोजन।

मूल शांति पूजन का अर्थपूर्ण उद्देश्य:

जब कोई व्यक्ति उपरोक्त नक्षत्रों में जन्म लेता है, तो ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार उसे संभावित बाधाओं या कष्टों से बचाने के लिए मूल दोष शांति की जाती है। इसमें नवग्रह पूजन, नक्षत्र स्वामी की पूजा, हवन, ब्राह्मण भोजन आदि सम्मिलित होते हैं।

संक्षेप में:

 

“मूल शांति पूजन” का अर्थ है –
गंडमूल नक्षत्रों के कारण उत्पन्न दोषों और उनके नकारात्मक प्रभावों को शांत करने हेतु किया गया धार्मिक, वैदिक अनुष्ठान।
यह पूजन जातक को जीवन में आने वाली कठिनाइयों से रक्षा करता है और उसे मानसिक, पारिवारिक एवं सामाजिक शांति प्रदान करता है।

मूल शांति पूजन

मूल शांति पूजन कब करना चाहिए?

मूल शांति पूजन को करने का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह पूजन जातक के जीवन और परिवार पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। उचित समय पर किया गया पूजन दोषों की शांति और जीवन में सुख-शांति लाने में सहायक होता है।

पूजन करने का श्रेष्ठ समय:

1. जन्म के 27वें दिन (नक्षत्र पुनरावृत्ति पर):

  • सबसे उपयुक्त समय होता है जातक के जन्म के 27वें दिन यानी जब उसी नक्षत्र का पुनः गोचर होता है।

  • इसे “नक्षत्र पुनरागमन दिवस” कहा जाता है।

2. पहले जन्मदिन पर (1 वर्ष की आयु में):

  • यदि 27वें दिन पूजन न किया जा सके, तो पहले जन्मदिवस पर किया जा सकता है।

  • विशेष रूप से परिवारिक दोषों की शांति हेतु यह समय उत्तम माना जाता है।

3. बाद में किसी शुभ मुहूर्त में:

  • अगर पहले दो अवसरों पर पूजन नहीं हो पाया हो, तो बाद में भी किसी शुभ मुहूर्त, मूल नक्षत्र दिवस, या केतु ग्रह की शुभ स्थिति में पूजन किया जा सकता है।

विशेष स्थिति में मूल शांति पूजन आवश्यक होता है:

  • जातक के जीवन में बार-बार बाधाएं आ रही हों

  • माता-पिता को शारीरिक या मानसिक कष्ट हो रहा हो

  • कुंडली में गंडमूल दोष की पुष्टि हो रही हो

  • विवाह, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में रुकावट हो रही हो

टिप्पणी:

पूजन करवाने से पूर्व ज्योतिष विशेषज्ञ से परामर्श करके जन्म नक्षत्र की स्थिति, दोष की तीव्रता और अनुकूल मुहूर्त की पुष्टि अवश्य कर लें।

मूल शांति पूजन

गंडमूल / मूल नक्षत्र की सूची:

गंडमूल दोष मुख्यतः 6 नक्षत्रों से जुड़ा होता है:

क्रमनक्षत्रनक्षत्र स्वामी
1️⃣अश्विनी (Ashwini)केतु
2️⃣अश्लेषा (Ashlesha)बुध
3️⃣मघा (Magha)केतु
4️⃣ज्येष्ठा (Jyeshtha)बुध
5️⃣मूल (Moola)केतु
6️⃣रेवती (Revati)बुध

मूल शांति पूजन का मुख्य महत्व:

1. ग्रहदोषों की शांति के लिए:

मूल नक्षत्र विशेषकर केतु, राहु या अन्य ग्रहों की अशुभ स्थिति से संबंधित होता है। इस पूजन से ग्रहों की क्रूरता और उनकी अशुभता को शांत किया जाता है।

 

2. जातक और परिवार की सुरक्षा:

कई बार ऐसा माना जाता है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालक का प्रभाव उसकी माता, पिता या अन्य परिजनों पर पड़ सकता है। इस पूजन से उनके स्वास्थ्य और आयु की रक्षा होती है।

 

3. आयु, स्वास्थ्य और समृद्धि में वृद्धि:

यह पूजन जातक को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्रदान करता है। नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।

 

4. शुभ और कल्याणकारी फल प्राप्ति:

इस पूजन के माध्यम से मूल दोष के कारण आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, और जीवन में शुभता आती है। विवाह, शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय आदि में आने वाली रुकावटें कम होती हैं।

 

5. धार्मिक और पारंपरिक संतुलन बनाए रखने हेतु:

यह पूजन वैदिक परंपराओं और ज्योतिषीय नियमों के अनुसार किया जाता है, जिससे जातक का जीवन धर्म और आध्यात्मिकता से जुड़ा रहता है।

संक्षेप में कहें तो:

“मूल शांति पूजन एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है, जो नक्षत्र दोषों से जातक और उसके परिवार को बचाता है और सुख-शांति, समृद्धि तथा स्वास्थ्य प्रदान करता है।”

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