सर्वतोभद्र मण्डल पूजन
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सर्वतोभद्र मण्डल पूजन
सर्वतोभद्र मण्डल पूजन एक विशेष और प्राचीन वैदिक अनुष्ठान है, जो विशेष रूप से यज्ञ, संस्कार, वास्तु पूजन, ग्रह शांति, और अन्य शुभ कार्यों के अवसर पर किया जाता है। यह मण्डल चारों दिशाओं से शुभता और सुरक्षा प्रदान करता है, इसलिए नाम “सर्वतोभद्र”, जिसका अर्थ है – सभी दिशाओं से शुभ।
सर्वतोभद्र मण्डल पूजन का अर्थ:
“सर्वतोभद्र मण्डल पूजन” एक वैदिक परंपरा है जिसमें चारों दिशाओं से शुभता और सुरक्षा के लिए एक विशेष प्रकार का मण्डल बनाकर उसका पूजन किया जाता है। यह मण्डल 64 खानों वाला होता है और इसमें नवग्रह, नक्षत्र, राशियाँ, दिशाएँ, तत्त्व और देव शक्तियाँ प्रतिष्ठित की जाती हैं।
शब्दार्थ के अनुसार:
सर्वतो = सभी ओर से / चारों दिशाओं से
भद्र = शुभ, कल्याणकारी, मंगलमय
मण्डल = एक योजनाबद्ध रचना या चित्र जो ब्रह्मांडीय शक्तियों का प्रतीक होता है
पूजन = आराधना या उपासना
अर्थात — एक ऐसा पूजन जिसमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा, दिशाओं, ग्रहों, नक्षत्रों और देव शक्तियों को चारों ओर से आमंत्रित कर, उनके माध्यम से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की कामना की जाती है।
इस पूजन का आध्यात्मिक अर्थ:
यह मान्यता है कि ब्रह्मांड में जो कुछ भी है – दिशाएं, ग्रह, नक्षत्र, तत्त्व – वह सब हमारे जीवन को प्रभावित करता है।
जब हम सर्वतोभद्र मण्डल बनाकर पूजन करते हैं, तो हम इन सभी शक्तियों को जागृत कर उनसे अनुकूलता प्राप्त करने का आग्रह करते हैं।
धार्मिक और व्यावहारिक दृष्टि से इसका उद्देश्य:
कार्य में कोई विघ्न न आए
वास्तु या ग्रह दोष का शमन हो
परिवार और स्थान पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो
शुभ कार्य (विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, संस्कार आदि) निर्विघ्न संपन्न हों
संक्षेप में:
“सर्वतोभद्र मण्डल पूजन का अर्थ है — संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्तियों का सम्मानपूर्वक आह्वान कर, जीवन के हर क्षेत्र में सौभाग्य, स्वास्थ्य, सुरक्षा और समृद्धि की प्राप्ति करना।”
- राशी और नक्षत्र आधारित मुहूर्त।
- आपके चयनित स्थान पर।
- आपके समय और सुविधा के अनुसार।
- किसी भी समय पंडित जी उपलब्ध हैं।
- सभी वैदिक मानक एवं प्रक्रियाएँ।
- प्रमाणित एवं अनुभवी पुजारी।
- संकल्प+पूजा+जाप+हवन+दान।
- एक ही छत के नीचे सभी समाधान।
सर्वतोभद्र मण्डल का महत्व
मूल शांति पूजन को करने का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह पूजन जातक के जीवन और परिवार पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। उचित समय पर किया गया पूजन दोषों की शांति और जीवन में सुख-शांति लाने में सहायक होता है।
सर्वतोभद्र मण्डल का मुख्य महत्व:
1. चारों दिशाओं से सुरक्षा और शुभ प्रभाव
“सर्वतोभद्र” का अर्थ होता है – सभी दिशाओं से शुभ और कल्याणकारी।
मण्डल में 64 खानों के माध्यम से चारों दिशाओं की, और ब्रह्मस्थान की पूजा होती है, जिससे दिक्पाल, नवग्रह, नक्षत्र, राशियाँ और देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
2. नवग्रह और नक्षत्र दोष शांति
मण्डल में नवग्रहों और 28 नक्षत्रों को स्थान दिया जाता है।
यह यज्ञ, पूजा या संस्कार में आने वाले ग्रह बाधाओं को शांत करता है।
3. वास्तु दोष निवारण में सहायक
यदि भवन निर्माण या पूजा स्थल में कोई वास्तु दोष हो, तो सर्वतोभद्र मण्डल के माध्यम से उसकी शांति संभव है।
यह सकारात्मक ऊर्जा के संचार को सुगम बनाता है।
4. शुभ मुहूर्त निर्धारण में सहयोगी
विवाह, यज्ञोपवीत, नामकरण, गृहप्रवेश आदि शुभ कार्यों में इसका पूजन करने से मुहूर्त दोष का प्रभाव कम होता है।
अनिष्ट योगों की शांति के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
5. यज्ञों की सिद्धि और पूर्णता
मण्डल पूजन से यज्ञ की पूर्णता, देवताओं का आह्वान, और अनुष्ठान की सफलता सुनिश्चित होती है।
यह ब्रह्मांडीय शक्तियों को आकर्षित करता है।
6. देवताओं, दिशाओं और तत्त्वों की संतुलन स्थापना
पंचतत्त्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) तथा दिशाओं (दिक्पालों) का संतुलन स्थापित होता है।
यह व्यक्ति, परिवार या संस्था को मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि प्रदान करता है।
संक्षेप में कहा जाए तो:
“सर्वतोभद्र मण्डल न केवल धार्मिक पूजन की प्रक्रिया का अंग है, बल्कि यह एक सूक्ष्म ऊर्जात्मक संरचना है जो साधक को पूर्ण सुरक्षा, शक्ति और सिद्धि प्रदान करती है।”
आवश्यक सामग्री:
आटे या रंगोली से बना मण्डल (64 खानों वाला वर्ग)
अक्षत, रोली, पुष्प, दूर्वा
कलश, जल पात्र, सुपारी, पंचमेव
नवग्रह व 28 नक्षत्रों की प्रतीकात्मक स्थापना हेतु चिन्ह
मंत्रोच्चार हेतु योग्य ब्राह्मण या स्वाध्याय
विशेष ध्यान दें:
यह पूजन किसी विद्वान पंडित की सहायता से कराना उचित रहता है।
मण्डल पूजन विशेषकर ग्रह दोष, नक्षत्र शांति, वास्तु दोष निवारण हेतु किया जाता है।
जातक के नक्षत्र और राशि अनुसार पूजन में विशिष्टता रखी जाती है।
सर्वतोभद्र मण्डल पूजन की विधि (विस्तृत)
1. प्रारंभिक तैयारी:
शुद्ध स्थान पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजन करें।
भूमि को गोमूत्र, गंगाजल से शुद्ध करें।
एक चौकोर मण्डल बनाएं – 8×8 = 64 खाने।
सफेद रंग या आटे, हल्दी, सिंदूर, या रंगोली पाउडर से मण्डल बनाएं।
3. पूजन विधि चरणबद्ध:
i. संकल्प:
“मम (नाम) गोत्रस्य (कार्य हेतु कारण) कर्मणि सर्वतोभद्र मण्डल पूजनं करिष्ये।”
iii. नवग्रह पूजन:
सूर्य से केतु तक नवग्रहों को स्थापित कर उनकी मंत्रों से पूजा करें।
v. दिक्पाल पूजन:
आठ दिशाओं के दिक्पाल – इंद्र, अग्नि, यम, नैऋत्य, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान की पूजा करें।
vii. दीप, धूप, नैवेद्य और आरती:
दीप प्रज्वलित कर, धूप दें।
नैवेद्य (फल, मिष्ठान्न) अर्पित करें।
समापन में आरती करें – “ॐ जय जगदीश हरे” या “शुभं करोति कल्याणम्…”
2. मण्डल निर्माण में क्या-क्या स्थापित करें:
नवग्रह – 9 स्थानों पर
27 या 28 नक्षत्र – एक-एक खाने में
12 राशियाँ – तदनुसार
दिक्पाल (दिशाओं के रक्षक) – आठ दिशाओं में
मुख्य देवता – ब्रह्मस्थान (मण्डल का मध्य)
कलश – ईशान कोण में
ii. मण्डल पूजन:
प्रत्येक खाने में थोड़े से अक्षत, पुष्प, दूर्वा, चंदन, कुंकुम अर्पित करें।
64 स्थानों का पूजन कर, उन्हें प्रणाम करें।
iv. नक्षत्र पूजन:
27 या 28 नक्षत्रों का ध्यान कर, फूल और अक्षत चढ़ाएं।
यदि जातक का जन्म नक्षत्र पता है तो उसे विशेष रूप से पूजें।
vi. कलश पूजन:
कलश में जल, सुपारी, पंचपल्लव, नारियल रखें।
ईशान कोण में स्थापित कर विष्णु, गणेश, दुर्गा आदि का आह्वान करें।
4. पूजन के बाद:
ब्राह्मण को दक्षिणा दें।
परिवार के सभी सदस्य मण्डल की परिक्रमा करें।
पूजन के फूल, जल आदि पवित्र स्थान या पीपल वृक्ष के नीचे विसर्जित करें।
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