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यज्ञोपवीत धारण

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यज्ञोपवीत धारण

यज्ञोपवीत धारण का अर्थ है “जनेऊ धारण करना”। यह हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पवित्र एवं महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। यह विशेष रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लड़कों द्वारा एक निश्चित आयु (आमतौर पर 8 वर्ष) में गुरु या पुरोहित की उपस्थिति में किया जाता है।

यज्ञोपवीत धारण का महत्व:

  • धार्मिक उत्तरदायित्व की शुरुआत: इसके साथ ही व्यक्ति को वेदाध्ययन, संध्या-वंदन और यज्ञ करने की योग्यता प्राप्त होती है।

  • गुरुकुल प्रवेश का प्रतीक: यह वह संस्कार है जिसके बाद बालक को आध्यात्मिक और सांसारिक शिक्षा के लिए योग्य माना जाता है।

  • तीनों ऋणों की स्मृति: यह ब्रह्मऋण, पितृऋण और देवऋण की स्मृति कराता है।

यज्ञोपवीत (जनेऊ) का स्वरूप:

  • यह तीन धागों से बना होता है, जिन्हें त्रैगुण्य (सत्त्व, रज, तम) या तीनों ऋणों का प्रतीक माना जाता है।

  • इसे बायें कंधे पर रखकर, दाहिने हाथ के नीचे से निकालकर पहना जाता है।

यज्ञोपवीत धारण

यज्ञोपवीत (उपनयन संस्कार) धारण की आयु हिन्दू धर्मशास्त्रों में वर्ण, परंपरा और शास्त्रीय मत के अनुसार भिन्न-भिन्न बताई गई है, लेकिन सामान्यतः यह बालक के ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश का संकेत होता है।

शास्त्रीय दृष्टि से यज्ञोपवीत धारण की आयु:

  • ब्राह्मण के लिए8 वर्ष (या 7 वर्ष पूरे होने पर 8वाँ वर्ष चल रहा हो)

  • क्षत्रिय के लिए11 वर्ष

  • वैश्य के लिए12 वर्ष

यह आयु “गर्भाधान से लेकर” मानी जाती है, न कि केवल जन्म से।
यह आयु सूर्य वर्ष (सौर काल) के अनुसार मानी जाती है, न कि केवल तिथि आधारित।

यदि निर्धारित आयु में न हो पाए तो?

मनुस्मृति के अनुसार यदि निर्धारित आयु में उपनयन संस्कार न हो तो वह अवशिष्ट (श्रेणी से नीचे) माना जाता है, लेकिन पुनः योग्य कर्मों द्वारा उसका परिमार्जन किया जा सकता है।

यज्ञोपवीत बाल्यावस्था में ही करना श्रेष्ठ माना जाता है, ताकि विद्यार्थी जीवन में ही वेदाध्ययन, संध्या-वंदन और ब्रह्मचर्य का पालन शुरू हो सके।

क्या वयस्क या बड़े व्यक्ति यज्ञोपवीत धारण कर सकते हैं?

हाँ, यदि किसी कारणवश बाल्यावस्था में संस्कार न हो पाया हो तो युवावस्था या वयस्क अवस्था में भी योग्य पंडित या गुरु के निर्देशन में विधिपूर्वक यज्ञोपवीत संस्कार किया जा सकता है। इसे “अवशिष्ट उपनयन” कहा जाता है।

यज्ञोपवीत धारण

यज्ञोपवीत धारण मंत्र:

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं
प्रजापतेः यत् सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं
यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

मंत्र का अर्थ:

  • — ईश्वर का पवित्र नाम

  • यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं — यह यज्ञोपवीत अत्यंत पवित्र है

  • प्रजापतेः यत् सहजं पुरस्तात् — जो प्रजापति ब्रह्मा से उत्पन्न हुआ, आदि काल से चला आ रहा है

  • आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं — यह उत्तम आयुष्य प्रदान करने वाला, उज्ज्वल और शुभ है

  • यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः — यह यज्ञोपवीत मुझे बल, तेज, और शक्ति प्रदान करे

यज्ञोपवीत धारण विधि

पूर्व तैयारी:

  • शुभ मुहूर्त निकालें (पंडित से पूछकर)

  • यज्ञोपवीत (जनेऊ), कुशा, वस्त्र, पवित्री जल, पंचामृत, गौमूत्र आदि एकत्र करें

  • वेदी सजाएं, देवताओं की स्थापना करें

मुख्य विधि चरणबद्ध रूप में:

1. स्नान एवं शुद्धि:

  • बालक (जिसका उपनयन हो रहा हो) को स्नान कराएं

  • शुद्ध वस्त्र पहनाएं

  • तिलक लगाएं

3. गुरुपूजन / देवपूजन:

  • आचार्य या गुरु का पूजन करें

  • गणेश, विष्णु, ब्रह्मा, गायत्री माता आदि की पूजा करें

5. गायत्री मंत्र दीक्षा (महत्वपूर्ण चरण):

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

    • गुरु यह मंत्र तीन बार सिखाते हैं

    • बालक इसे तीन बार उच्चारण करता है

7. ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण:

  • बालक ब्रह्मचर्य पालन का संकल्प लेता है

  • गुरु उसे नियमों की शिक्षा देता है (जैसे सत्य बोलना, संयम, नियमपालन)

2. संकल्प:

आचमन के बाद संकल्प करें:

“मम उपनयन संस्कारार्थं, यज्ञोपवीत धारणं करिष्ये।”

 

4. जनेऊ धारण मंत्र के साथ धारण करें:

 

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं
प्रजापतेः यत् सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं
यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

  • इस मंत्र का उच्चारण करते हुए गुरु या आचार्य बालक को जनेऊ पहनाते हैं।

  • जनेऊ को बाएँ कंधे से लेकर दाएँ बगल के नीचे निकालकर पहनाया जाता है।

6. भिक्षाटन अनुष्ठान (प्रतीकात्मक):

  • बालक अंजलि जोड़कर भिक्षा मांगता है:

“भिक्षां देहि।”

  • यह गुरु आज्ञा पालन और विनम्रता का प्रतीक होता है

7. ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण:

  • बालक ब्रह्मचर्य पालन का संकल्प लेता है

  • गुरु उसे नियमों की शिक्षा देता है (जैसे सत्य बोलना, संयम, नियमपालन)

8. आशीर्वाद और पूर्णाहुति:

  • यज्ञ/हवन किया जाता है

  • गुरु, पितृगण व अतिथियों से आशीर्वाद लिया जाता है

  • सबको तिलक व प्रसाद दिया जाता है

यज्ञोपवीत धारण के प्रमुख नियम:

1. हमेशा शुद्ध अवस्था में रखें:

  • यज्ञोपवीत को शरीर पर शुद्धता और पवित्रता के साथ पहनना चाहिए।

  • मल-मूत्र त्याग, स्नान से पहले, या अपवित्र अवस्था में इसे स्पर्श नहीं करना चाहिए।

2. संध्या-वंदन अनिवार्य:

  • यज्ञोपवीत धारक को दिन में तीन बार (प्रातः, मध्यान्ह, संध्या) संध्या-वंदन एवं गायत्री जप करना अनिवार्य है।

  • इससे आत्मिक शुद्धि और ब्रह्मचर्य का पालन होता है।

3. सदा अपवित्र कार्यों से बचें:

  • मांस, मद्य, जुआ, झूठ, चोरी आदि कुकर्मों से बचना चाहिए।

  • यह एक धार्मिक उत्तरदायित्व है, जिससे जीवन में ब्रह्मचर्य, संयम और साधना बनी रहती है।

4. यज्ञोपवीत के पहनने का तरीका:

  • इसे बाएँ कंधे पर और दाहिने बगल के नीचे से पहनना चाहिए (जिसे “उपनित अवस्था” कहते हैं)।

  • विशेष कर्मों (श्राद्ध, पिंडदान आदि) में इसे उल्टा पहनना होता है (प्राचीनावीत)।

5. टूटने या अशुद्ध होने पर नया धारण करें:

  • यदि यज्ञोपवीत फट जाए, टूट जाए या अत्यधिक अशुद्ध हो जाए तो उसे बदल देना चाहिए।

  • नया यज्ञोपवीत मंत्रोच्चारण से विधिपूर्वक धारण करें।

6. सोते समय और नित्य क्रिया में ध्यान रखें:

  • सोते समय यज्ञोपवीत शरीर पर ही रहना चाहिए।

  • स्नान के समय उसे कान पर चढ़ाकर रखें या विशेष धारण विधि के साथ रखें।

7. सार्वजनिक स्थानों पर सावधानी रखें:

  • यज्ञोपवीत को खुला लटकता न छोड़ें, विशेषकर अशुद्ध वातावरण में।

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