भूमि पूजन
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भूमि पूजन
भूमि पूजन एक शुभ धार्मिक अनुष्ठान होता है जो किसी नई भूमि पर निर्माण कार्य (जैसे घर, भवन, फैक्ट्री आदि) शुरू करने से पहले किया जाता है। इसका उद्देश्य पृथ्वी देवी से अनुमति लेना, नकारात्मक शक्तियों को शांत करना, और निर्माण कार्य के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करना होता है।
भूमि पूजन का महत्व:
निर्माण कार्य में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
घर या भवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
दोषपूर्ण भूमि या वास्तु दोष के प्रभाव कम होते हैं।
दैवीय कृपा प्राप्त होती है।
भूमि पूजन विधि:
1. शुभ मुहूर्त का चयन:
ब्राह्मण या पंडित से परामर्श कर शुभ तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न के अनुसार मुहूर्त चुनें।
आमतौर पर भद्रा, राहुकाल और अमावस्या जैसे अशुभ समय से बचा जाता है।
2. पूजन सामग्री:
कलश, रोली, चावल, सुपारी, फूल, नारियल, गंगाजल, लाल कपड़ा, हवन सामग्री, ईंट, हल्दी, दीपक, शंख, दूध, पंचामृत आदि।
3. प्रमुख पूजन क्रियाएं:
भूमि शुद्धि: गंगाजल व गोमूत्र से भूमि को शुद्ध किया जाता है।
दीप प्रज्वलन: भगवान गणेश की पूजा से प्रारंभ करते हैं।
नवग्रह पूजन: नवग्रहों की शांति के लिए विशेष पूजन।
वास्तु पूजन: वास्तु देवता की कृपा हेतु पूजन।
भूमि देवी पूजन: पृथ्वी माता से क्षमा याचना करते हुए पूजा।
खुदाई का कार्य: पूजन के बाद विधिवत पहले कुदाल या फावड़े से भूमि खुदाई की जाती है।
4. हवन और मंत्रोच्चार:
- विशेष वैदिक मंत्रों के साथ हवन कर सकारात्मक ऊर्जा का आवाहन किया जाता है।
- राशी और नक्षत्र आधारित मुहूर्त।
- आपके चयनित स्थान पर।
- आपके समय और सुविधा के अनुसार।
- किसी भी समय पंडित जी उपलब्ध हैं।
- सभी वैदिक मानक एवं प्रक्रियाएँ।
- प्रमाणित एवं अनुभवी पुजारी।
- संकल्प+पूजा+जाप+हवन+दान।
- एक ही छत के नीचे सभी समाधान।
भूमि पूजन क्यों करना चाहिए:
भूमि पूजन वैदिक परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना गया है। इसे करने के पीछे आध्यात्मिक, धार्मिक, और वैज्ञानिक तीनों प्रकार के कारण होते हैं। नीचे इसके प्रमुख कारण दिए गए हैं:
1. पृथ्वी माता से अनुमति और क्षमा याचना के लिए
जब हम किसी ज़मीन पर खुदाई या निर्माण कार्य करते हैं, तो पृथ्वी माता की गोद में हस्तक्षेप करते हैं। भूमि पूजन के माध्यम से हम उनसे अनुमति लेते हैं और उनसे क्षमा मांगते हैं कि हम उनके शरीर को काटने या खोदने जा रहे हैं।
2. नकारात्मक ऊर्जा और दोषों की शुद्धि के लिए
हर भूमि में कुछ न कुछ ऊर्जा होती है – सकारात्मक या नकारात्मक। भूमि पूजन से भूमि में विद्यमान वास्तु दोष, पितृ दोष या भू-दोष आदि को शांत किया जाता है जिससे भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी न हो।
3. देवताओं और वास्तु देवता को प्रसन्न करने के लिए
भूमि पूजन में गणेश पूजन, नवग्रह पूजन और वास्तु पूजन प्रमुख होता है। इससे देवताओं की कृपा बनी रहती है और कार्य में सफलता मिलती है।
4. निर्माण कार्य में रुकावटें दूर करने के लिए
यदि भूमि पूजन न किया जाए, तो निर्माण कार्य के दौरान अकारण रुकावटें, आर्थिक हानि, दुर्घटनाएं या अन्य समस्याएं हो सकती हैं। भूमि पूजन से इन सभी का निवारण होता है।
5. परिवार व स्थान की सुख-शांति के लिए
जिस स्थान पर भूमि पूजन होता है, वहां सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जो वहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य, मानसिक शांति और समृद्धि में सहायक होता है।
6. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से
भूमि पूजन में की जाने वाली हवन क्रिया वायु को शुद्ध करती है।
भूमि परीक्षण और भूमि की खुदाई से उसकी गुणवत्ता और उर्वरता का भी आकलन किया जाता है।
यह एक मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी भी होती है कि हम एक नई शुरुआत कर रहे हैं।
भूमि पूजन से पूर्व इन बातों का रखें ध्यान:
भूमि का समतलीकरण और साफ-सफाई करें।
भूमि में कांटे, कांच, हड्डियाँ, बाल या कील आदि न हों।
भूमि में पहले पूजा फिर निर्माण — यह क्रम हमेशा शुभ होता है।
अगर भूमि पर पहले कोई भवन था तो उसकी पूर्व शुद्धि ज़रूरी है।
भूमि पूजन में वास्तु दिशा का रखें ध्यान:
भूमि पूजन करते समय वास्तु शास्त्र के अनुसार दिशा और स्थान का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है। यदि भूमि पूजन और निर्माण कार्य सही दिशा में प्रारंभ हो, तो घर या भवन में सुख-शांति, समृद्धि और आरोग्य बना रहता है।
वास्तु दिशा अनुसार भूमि पूजन के महत्वपूर्ण नियम:
1. ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) सबसे शुभ मानी जाती है:
भूमि पूजन और प्रथम खुदाई ईशान कोण से ही करनी चाहिए।
कलश स्थापना, हवन कुंड, और नारियल स्थापना इसी दिशा में करें।
यह दिशा देवताओं और सकारात्मक ऊर्जा की दिशा मानी जाती है।
2. द्वार या प्रवेश मार्ग की दिशा:
- भवन का मुख्य द्वार उत्तर, पूर्व, या उत्तर-पूर्व दिशा में होना शुभ माना जाता है।
3. वास्तु पुरुष स्थापना:
भूमि पूजन के समय वास्तु पुरुष मंडल का पूजन किया जाता है, जो भूमि की 45 देवताओं को समर्पित होता है।
इन देवताओं की दिशा अनुसार पूजन क्रम और हवन समर्पण किया जाता है।
4. खुदाई किस दिशा से शुरू करें?
पहली खुदाई (Breaking Ground) उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) से शुरू करनी चाहिए।
पूर्व दिशा में भी प्रारंभ करना शुभ माना जाता है।
5. पूजन सामग्री और ब्राह्मण का आसन:
ब्राह्मण और पूजा सामग्री को पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके रखना चाहिए।
पूजक (जो पूजा करवा रहा है) को भी उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
6. वास्तु दोष निवारण के लिए विशेष ध्यान दें:
यदि भूमि तिरछी, त्रिकोण या अनुपयुक्त आकार की हो तो पहले वास्तु शांति का विशेष पूजन करें।
भूमि में यदि कुआँ, पेड़, पुरानी नींव, या कोई दोष हो तो पहले उसकी शुद्धि और उपाय करें।
विशेष मंत्र (संक्षिप्त):
ॐ भूम्यै नमः
ॐ वास्तुपुरुषाय नमः
ॐ गणाध्यक्षाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
महत्वपूर्ण सुझाव:
पूजा किसी योग्य ब्राह्मण की उपस्थिति में कराएं।
सभी सामग्री शुद्ध और सात्विक होनी चाहिए।
भूमि पूजन के दिन व्रत या सात्विक भोजन रखें।
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