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नान्दीमुखी श्राध्द

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नान्दीमुखी श्राध्द

नान्दीमुखी श्राद्ध एक विशेष प्रकार का श्राद्ध होता है, जो किसी शुभ कार्य (जैसे – विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश, या यज्ञ आदि) के पहले पितरों की कृपा प्राप्ति और आशीर्वाद के लिए किया जाता है। इसे नन्दी श्राद्ध, नन्दीमुख श्राद्ध या नन्दीमुखी श्राद्ध भी कहा जाता है।

नान्दीमुखी श्राद्ध का अर्थ:

  • “नान्दी” का अर्थ होता है – शुभ आरंभ।

  • “श्राद्ध” का अर्थ है – श्रद्धा से पितरों को तर्पण करना।

  • यानी यह एक ऐसा श्राद्ध है जो किसी शुभ कार्य के आरंभ से पूर्व पितरों को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है।

कब किया जाता है?

नान्दीमुखी श्राद्ध निम्न अवसरों से पहले किया जाता है:

  • विवाह संस्कार से पहले

  • उपनयन (जनेऊ) संस्कार से पहले

  • गृह प्रवेश से पहले

  • यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान से पहले

  • बच्चे के प्रथम संस्कारों (नामकरण, अन्नप्राशन आदि) से पहले

नान्दीमुखी-श्राध्द

नान्दीमुखी श्राद्ध का महत्व

नान्दीमुखी श्राद्ध वैदिक परंपरा का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण कर्म है, जिसे किसी भी शुभ कार्य (संकल्पित मंगल कर्म) जैसे—विवाह, यज्ञोपवीत (जनेऊ), नामकरण, गृह प्रवेश, अन्नप्राशन, यज्ञ, शांति पाठ आदि से पूर्व पितरों की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है।

नान्दीमुखी श्राद्ध का प्रमुख उद्देश्य:

1. पितृआशीर्वाद प्राप्त करना:
शुभ कार्यों में पितरों की कृपा अत्यावश्यक मानी गई है। यह श्राद्ध पितरों को प्रसन्न कर उनके आशीर्वाद के रूप में कार्य की सिद्धि हेतु किया जाता है।

2. कर्मशुद्धि व शांति:
यह कर्म व्यक्ति के भावी मंगल कार्यों की शुद्धि, शांति और सफलता हेतु मार्ग प्रशस्त करता है।

3. पूर्वजों की स्मृति और सम्मान:
यह श्राद्ध पूर्वजों की स्मृति को जागृत करता है और उन्हें श्रद्धापूर्वक सम्मान देने का अवसर देता है।

4. कर्मों में विघ्न न आए:
मान्यता है कि यदि पितर अप्रसन्न हों तो कार्यों में बाधाएँ आती हैं। यह श्राद्ध उन विघ्नों को दूर करता है।

धार्मिक महत्व:

  • गरुड़ पुराण और गृह्यसूत्रों में इसका वर्णन मिलता है।

  • यह श्राद्ध “नान्दी” (अर्थात शुभारंभ) का प्रतीक होता है – जिससे यह शुभ कार्यों की सफलता के लिए पितृलोक का मार्ग प्रशस्त करता है।

  • इससे वर्तमान और भावी पीढ़ी पर पितरों की कृपा बनी रहती है।

शास्त्रीय मान्यता:

“श्राद्धे पूर्वं नान्दीमुखं कुर्यात्।”

(अर्थ: कोई भी धार्मिक या सामाजिक शुभ कार्य करने से पहले नान्दीमुख श्राद्ध करना चाहिए।)

नान्दीमुखी-श्राध्द

संक्षेप में – नान्दीमुखी श्राद्ध:

तत्वविवरण
प्रयोजनशुभ कार्यों की सफलता व पितृ कृपा
समयविवाह, उपनयन, यज्ञ आदि से पहले
लाभपितृ तृप्ति, कृपा, विघ्नहर्ता, कर्मसिद्धि
कर्म विधानपिंड दान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन व दान

नान्दीमुखी श्राद्ध की विधि

1. संकल्प:

श्रद्धा व भक्तिभाव से संकल्प करें:

“मम समस्तकर्मसिद्ध्यर्थं पितृप्रीत्यर्थं नान्दीमुखश्राद्धं करिष्ये।”

(अर्थ: मेरे समस्त शुभ कार्यों की सफलता और पितरों की प्रसन्नता हेतु नान्दीमुख श्राद्ध करूँगा।)

 

3. पूजा स्थल की तैयारी:

  • शुद्ध स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

  • एक चौकी या आसन पर सफेद वस्त्र बिछाएं।

  • उस पर पितरों के लिए स्थान निर्धारित करें।

5. तर्पण विधि:

जल, तिल और कुशा लेकर निम्न मंत्र से तर्पण दें:

“ॐ पितृभ्यो नमः।”
“ॐ मातामहभ्यो नमः।”
(तीन बार प्रत्येक तर्पण देना चाहिए)

 

7. आशीर्वाद ग्रहण:

ब्राह्मणों और घर के बड़ों से आशीर्वाद लें, कि पितर प्रसन्न हों और शुभ कार्य निर्विघ्न संपन्न हो।

2. आवश्यक सामग्री:

  • कुशा, तिल, अक्षत (चावल)

  • जलपात्र, पंचामृत

  • गाय का घी

  • 5 या 7 पिंड बनाने के लिए cooked चावल

  • ताम्बूल, फल, फूल

  • ब्राह्मणों के लिए वस्त्र, दक्षिणा

  • तिलांजलि व तर्पण हेतु पात्र

4. पिंड दान:

  • चावल, तिल, घी आदि मिलाकर 5 या 7 पिंड बनाएं।

  • हर पिंड को निम्नलिखित मंत्र के साथ अर्पण करें:

“इदं पिण्डं पितृभ्यः नमः।”

 

6. ब्राह्मण भोजन और दान:

  • न्यूनतम दो ब्राह्मणों को भोजन कराएं।

  • एक को पितरों का प्रतिनिधि मानें और दूसरे को विष्णु रूप।

  • उन्हें वस्त्र, फल, दक्षिणा और ताम्बूल अर्पित करें।

महत्वपूर्ण नियम:

  • यह श्राद्ध विशेष रूप से उन्हीं पितरों के लिए किया जाता है जिनका श्राद्ध हर वर्ष किया जाता है।

  • इसे शुभ कार्य से ठीक एक या दो दिन पहले करें।

  • यदि परिवार में पितरों का कोई श्राद्ध नहीं होता है, तब भी नान्दीमुखी श्राद्ध कर सकते हैं।

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