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अहोही अष्टमी

अहोही अष्टमी पूजा: व्रत की विधि, तिथि और धार्मिक महत्व

भारतवर्ष में अनेक पर्व और व्रत महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति और संतान की लंबी उम्र के लिए करती हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है अहोही अष्टमी पूजा। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपने पुत्रों की रक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए करती हैं। इस लेख में हम जानेंगे अहोही अष्टमी व्रत की विधि, पूजा का महत्व, कथा और पूजन सामग्री के बारे में।

अहोही अष्टमी पूजा कब मनाई जाती है?

अहोही अष्टमी तिथि

अहोही अष्टमी व्रत कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो करवाचौथ के चार दिन बाद और दीपावली से कुछ दिन पूर्व आता है। इस दिन महिलाएं निर्जल व्रत रखती हैं और संतान की मंगलकामना के लिए अहोही माता का पूजन करती हैं।

अहोही अष्टमी पूजा विधि

व्रत की शुरुआत

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  • घर की दीवार पर गेरू और चावल के मिश्रण से अहोही माता की आकृति बनाएं।

  • पास में चूहा और सेई (नेवला) की आकृति भी बनाना आवश्यक होता है।

पूजन सामग्री

  • गेरू, चावल का आटा, हल्दी, रोली

  • कच्चा दूध, बताशे, सूत, जल का कलश

  • सूप, चूड़ा, पूड़ी, पकवान, कथा पुस्तक

पूजा का क्रम

  • संकल्प लेकर माता अहोही की कथा पढ़ें या सुनें।

  • पूजा के अंत में अहोही माता से संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना करें।

  • रात्रि में तारे देखकर व्रत का पारण किया जाता है।

अहोही अष्टमी व्रत कथा

एक साहूकार की सात बहुएं थीं, जिनमें सबसे छोटी बहू बहुत ही संयमी और धार्मिक थी। एक बार सभी बहुएं पूजा के बाद खेत में मिट्टी खोदने गईं, जहां एक साही का बच्चा मर गया। उस दोष के कारण सातों की संतान मृत हो गई। छोटी बहू को जब सच्चाई का ज्ञान हुआ, तब उसने पश्चाताप कर अहोही अष्टमी का व्रत किया और अपनी संतान को पुनः जीवित कर लिया। तभी से यह व्रत प्रचलन में आया।

अहोही अष्टमी व्रत का महत्व

  • यह व्रत पुत्र की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सद्गुणों की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

  • महिलाएं इस दिन कठोर नियमों का पालन कर माता से कृपा की याचना करती हैं।

  • यह व्रत पारिवारिक समृद्धि और सौभाग्य भी प्रदान करता है।

अहोही अष्टमी व्रत में सावधानियाँ

  • व्रत के दिन झूठ न बोलें और विवाद से बचें।

  • दिनभर निर्जल रहें और संयमित रहें।

  • पूजा की सामग्री शुद्ध और सात्विक होनी चाहिए।

निष्कर्ष

अहोही अष्टमी पूजा भारतीय परंपरा में मातृत्व की शक्ति और संतान के प्रति प्रेम का प्रतीक है। इस व्रत के माध्यम से माताएं संतान के सुखी और सुरक्षित जीवन की कामना करती हैं। धर्म, आस्था और परंपरा से जुड़ा यह पर्व समाज में सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अहोही अष्टमी व्रत कब मनाया जाता है?

अहोही अष्टमी व्रत कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो करवाचौथ के चार दिन बाद आता है।

इस व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करना होता है।

यह व्रत मुख्यतः विवाहित महिलाएं अपने पुत्र या संतान की भलाई के लिए रखती हैं।

इस दिन अहोही माता की पूजा की जाती है, साथ ही चूहा और नेवले (सेई) का प्रतीकात्मक चित्र भी पूजन में सम्मिलित होता है।

व्रती महिलाएं दिनभर निर्जल व्रत रखती हैं, दीवार पर अहोही माता की चित्र बनाकर पूजा करती हैं, और तारे देखकर व्रत का पारण करती हैं।

यह कथा एक साहूकार की बहुओं से जुड़ी है, जिसमें एक बहू द्वारा गलती से साही के बच्चे की मृत्यु हो जाती है और फिर पश्चाताप स्वरूप व्रत करके संतान की रक्षा पाती है।

हाँ, इस दिन व्रती को झूठ नहीं बोलना चाहिए, व्रत के दौरान संयम और सात्विकता का पालन करना चाहिए और पूजा सामग्री शुद्ध होनी चाहिए।

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